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Pushpendrasaroj: कौन हैं पुष्पेंद्र सरोज? सपा के युवा सांसद क्यों बने सुर्खियों में

Pushpendrasaroj: देश की राजनीति में इस समय समाजवादी पार्टी के एक युवा और दलित सांसद की खूब चर्चा हो रही है. इन्होंने अपने दमदार भाषणों और अलग सियासी अप्रोच से सबका ध्यान खींचा है. बात हो रही है कौशांबी से सपा के नवनिर्वाचित सांसद पुष्पेंद्र सरोज की. दावा किया जाता है कि पुष्पेंद्र भारतीय संसद के सबसे युवा सांसदों में से एक हैं. वह इन दिनों दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी के बैनर तले नीट NEET धांधली और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर चल रहे प्रोटेस्ट को समर्थन देने पहुंचे थे. यहां उनके एक भाषण का हिस्सा सोशल मीडिया पर जबरदस्त वायरल हो रहा है. जंतर-मंतर पर वैज्ञानिक और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचू और कॉकरोच जनता पार्टी के अभिजीत दीपके के समर्थन में पहुंचने वाले यूपी के पहले सांसद पुष्पेंद्र सरोज बने. युवाओं के बीच उनके भाषण की एक-एक लाइन पर खूब तालियां बजीं. पुष्पेंद्र ने मंच से कहा ‘कहा जाता है कि जब सड़कें खामोश हो जाती हैं तो संसद आवारा हो जाती है. मैं आपका धन्यवाद देता हूं कि आपने सड़कों को खामोश नहीं होने दिया. मैं वादा करता हूं कि आपके हक के लिए संसद को आवारा नहीं होने दूंगा. सूरज ने डूबते हुए पूछा था कि मेरी जगह कौन संभालेगा, तब एक छोटे से दीये ने कहा था कि मैं कोशिश कर सकता हूं. आप सब हमारे देश के नौजवानों के लिए वही उम्मीद का दीया हैं.’इसके साथ ही उन्होंने शायराना अंदाज में विरोधियों पर तंज कसते हुए कहा ‘वो एक समंदर खंगालने में लगे हैं, हमारी कमियां निकालने में लगे हैं… जिनकी खुद की लंगोटियां हैं फटी हुई, वो हमारी पगड़ी उछालने में लगे हैं.’जाहिर तौर पर पुष्पेंद्र का यह निशाना बीजेपी पर था

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पुष्पेंद्र सरोज एक मजबूत राजनीतिक घराने से आते हैं. उनके पिता इंद्रजीत सरोज पूर्वांचल के बड़े और कद्दावर दलित नेता हैं जो वर्तमान में सपा के राष्ट्रीय महासचिव हैं और मायावती सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं. लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव ने कौशांबी की उस सीट से युवा पुष्पेंद्र पर दांव लगाया जहां बीजेपी लगातार जीत रही थी और कुंडा के बाहुबली नेता राजा भैया का खासा प्रभाव माना जाता था.इसके वाबजूद भी पुष्पेंद्र ने भारी मतो से जीत दर्ज की
पुष्पेंद्र सरोज के पिता बड़े नेता थे. पैसों की कोई कमी नहीं थी. लेकिन उनकी अपनी एक अलग कहानी है. पुष्पेंद्र सरोज ने लंदन की प्रतिष्ठित क्वींस मैरी यूनिवर्सिटी से अकाउंटिंग और मैनेजमेंट में बीएससी की डिग्री हासिल की है. लंदन के दिनों को याद करते हुए पुष्पेंद्र बताते हैं कि ‘वहां का कल्चर और डेमोग्राफी बहुत अलग है. वहां रहने से इंसान में इंडिपेंडेंट बिहेवियर आता है. छोटे से छोटे काम से लेकर बड़ी पढ़ाई तक, सब खुद करना पड़ता है. मैंने लंदन में जानबूझकर बर्तन धोने और वेटर की नौकरी की थी. जब घर वालों को पता चला तो उन्हें अच्छा नहीं लगा. लेकिन वहां अलग-अलग देशों के लोगो के साथ काम करके, उनकी कहानियां सुनकर मुझे ग्राउंडेड रहने की सीख मिली. पैसों की दिक्कत नहीं थी जो कमाया वो दोस्तों के साथ उड़ा दिया. लेकिन उस काम ने मुझे सेवा भाव और मैच्योरिटी सिखाई.


‘बोर्डिंग स्कूल और फिर लंदन में पढ़ने वाले पुष्पेंद्र अक्सर कहते थे कि उन्होंने किताबों में और लोगों से दलित समाज के साथ होने वाले भेदभाव और प्रताड़ना की कहानियां सुनी थीं. लेकिन उन्हें लगता था कि वह एक बड़े नेता के बेटे हैं तो उनके साथ ऐसा कभी नहीं होगा. मगर जमीन पर जब वह खुद चुनाव लड़ने उतरे तो उनका यह भ्रम टूट गया.
पुष्पेंद्र बताते हैं ‘जब मैं गांव में चुनाव प्रचार के दौरान पम्फलेट बांट रहा था तब कुछ लोगों ने मेरे हाथों से पर्चा लेने से साफ मना कर दिया. मेरे साथ चल रहे स्थानीय कार्यकर्ताओं ने मुझसे कहा कि भैया पर्चा नीचे जमीन पर रख देते हैं, ये लोग हाथ से नहीं लेंगे. तब मुझे पहली बार अहसास हुआ कि रूरल इंडिया (ग्रामीण भारत) में आज भी जातिगत असमानता कितनी गहरी है.’

उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए समाजवादी पार्टी को दलित वोट बैंक को अपने पाले में मजबूती से जोड़े रखने की बेहद जरूरत है. ऐसे में ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के दलित एक्टिविस्ट अभिजीत दीपके से पुष्पेंद्र सरोज की यह मुलाकात और जंतर-मंतर पर युवाओं के हक में उठी उनकी आवाज, सपा की सोशल इंजीनियरिंग का एक बड़ा हिस्सा मानी जा रही है.

डिस्क्लेमर :

यह जानकारी सार्वजनिक स्रोतों और मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है। किसी भी राजनीतिक दावे, बयान या विचार का समर्थन या विरोध हमारा उद्देश्य नहीं है।

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