साल 1975. देश का राजनीतिक माहौल पूरी तरह बदल चुका था. 25 जून 1975 को देश में इमरजेंसी लागू हो चुकी थी. विपक्ष के कई नेता जेल में थे. प्रेस पर सेंसरशिप थी और कांग्रेस के भीतर भी केंद्रीय नेतृत्व का प्रभाव पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हो गया था. इसी दौर में उत्तर प्रदेश की कमान संभाल रहे थे हेमवती नंदन बहुगुणा. कांग्रेस के बड़े नेता, बेहतरीन संगठनकर्ता और दमदार बोलने वाले. उत्तर प्रदेश की राजनीति में उनका कद इतना बड़ा माना जाता था कि लखनऊ से लेकर दिल्ली तक उनकी बात सुनी जाती थी. लेकिन यही दौर उनके राजनीतिक जीवन का सबसे कठिन अध्याय भी बना.
हेमवती नंदन बहुगुणा का जन्म 25 अप्रैल 1919 को गढ़वाल (तत्कालीन संयुक्त प्रांत, अब उत्तराखंड) में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था. छात्र जीवन से ही वे स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े और ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में जेल भी गए. आजादी के बाद उन्होंने कांग्रेस संगठन में तेजी से अपनी पहचान बनाई. अपनी संगठन क्षमता, भाषण शैली और कार्यकर्ताओं के बीच मजबूत पकड़ की वजह से वे राष्ट्रीय नेतृत्व की नजर में आए.

1973 में कांग्रेस ने कमलापति त्रिपाठी की जगह हेमवती नंदन बहुगुणा को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया. 8 नवंबर 1973 को उन्होंने शपथ ली. इसके बाद 1974 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को बहुमत मिला और बहुगुणा दोबारा मुख्यमंत्री बने. उस समय उत्तर प्रदेश देश की राजनीति का सबसे अहम राज्य माना जाता था.1971 की लोकसभा चुनाव में बड़ी जीत और बांग्लादेश युद्ध के बाद इंदिरा गांधी का राजनीतिक कद बेहद ऊंचा था. लेकिन 1974-75 आते-आते महंगाई, छात्र आंदोलन, जेपी आंदोलन और राजनीतिक अस्थिरता ने सरकार पर दबाव बढ़ा दिया. फिर 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रायबरेली चुनाव मामले में इंदिरा गांधी के चुनाव को अमान्य ठहराया. इसके कुछ ही दिनों बाद 25 जून 1975 को देश में इमरजेंसी लागू कर दी गई. इमरजेंसी के बाद सत्ता में एक नए तरह की रेस आ गई. राज्यों के मुख्यमंत्री पर भी दिल्ली के फैसलों से सीधा असर होने लगा.
हेमवती नंदन बहुगुणा और कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के बीच समय के साथ मतभेद बढ़ने लगे। बहुगुणा मानते थे कि पार्टी और सरकार में फैसले लोकतांत्रिक तरीके से होने चाहिए और संगठन की अहम भूमिका होनी चाहिए। लेकिन उस समय इंदिरा गांधी के नेतृत्व में ज्यादातर फैसले कुछ लोगों तक सीमित होकर लिए जाने लगे। इसी वजह से दोनों के बीच दूरियां बढ़ती गईं। इमरजेंसी के दौरान बहुगुणा और संजय गांधी के रिश्ते भी अच्छे नहीं रहे। यही मतभेद आगे चलकर उनके राजनीतिक भविष्य पर भी असर डालने लगे।और आखिरकार उन्हनो 29 नंवम्बर 1975 को उन्होने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया इसके बाद हेमवती नंदन बहुगुणा की जगह नारायण दत्त तिवारी को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया गया।
मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद भी बहुगुणा शांत नहीं बैठे. 1977 में जब इमरजेंसी हटने के बाद चुनाव हुए, तो उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी और जगजीवन राम तथा नंदिनी सत्पथी के साथ Congress for Democracy का गठन किया. बाद में यह दल जनता पार्टी के साथ आ गया. उस समय स्वयं इंदिरा गांधी ने भी माना था कि उत्तर प्रदेश में बहुगुणा का प्रभाव कांग्रेस के लिए बड़ा झटका साबित हो सकता है.
हेमवती नंदन बहुगुणा की कहानी सिर्फ एक मुख्यमंत्री की विदाई की कहानी नहीं है. यह उस दौर की भी कहानी है, जब दिल्ली और राज्यों के रिश्ते बदल रहे थे, कांग्रेस के भीतर शक्ति संतुलन बदल रहा था और भारतीय लोकतंत्र इमरजेंसी जैसे कठिन दौर से गुजर रहा था. इसीलिए आज भी जब उत्तर प्रदेश की राजनीति के सबसे चर्चित अध्यायों की बात होती है. तो हेमवती नंदन बहुगुणा का नाम जरूर लिया जाता है.
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